इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ
कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ
उफ्फ फो दम ही निकल जाता मेरा
बैरी ने जो होंठों से मेरे मिलाए होंठ
एक सर्द तबस्सुमी शबनम ठहर गई
ज़ेरो - ज़बर बगैर, मेरे कंपकपाए होंठ
जिन लम्हों को बिसारने में, हयात गई
उन्हीं लम्हों से मिला के मेरे हटाए होंठ
एक उम्र सजा पाई, लम्हों की भूल ने
सुर्खी नोच के वक्त ने मेरे सुखाए होंठ
वैसे परिंदे ने किस चमन में गाया होगा
किस नशेमन के तईं मेरे काट खाए होंठ
दिले गिरफ्तगी ने मुझे यूं कर जकङ लिया
हुई आवाज पराई ओ हुए मेरे पराए होंठ
आज भी लजाती है बंद ए कबा खुलते
आज भी दुआगो, गर मेरे देख पाए होंठ
जतन कर, कोई हल निकाल #प्रतिभा
बिन आवाज उसे, मेरे पुकार पाएं होंठ
प्रतिभा चौहान
बन्द ए कबा ( कमर बन्द)
दिले गिरफ्तगी ( दिल को उदासी )
दुआ गो ( दुआ करना )



