एक शब है जो ,
बिस्तर की सिलवटों में
छुपा के मुँह रोती रहती है
अफसूँ देख मेरे आंसू का
सिसकते लफ़्ज़ों को धोती है
अंदाज़ लगा लेना तुम अब
मेरे साये के रिदाओं से
तन्हाईयाँ कितनी?
कैसी थी?
इक निगोड़ी जोगन की
उजले सुथरे कागज़ की
नियत का आलम क्या पूछो?
ख़ौफ़ के घूंघट ओढ़े है
निगारिश इस जोबन की
एक घेर हुआ था जो बाहों का
वो सर्द आहों की पनाहों का
कुछ मथुरा सा कुछ काशी सा
या कलीसा, या ढहती मीनारों सा
या था अंधी गुफ़ाओं में
कुछ कुछ खजुराहों सा
कान में था फिर शोर सन्नाटों सा
फिर एक क़हर सितम इज़ादों का
अब एक उजड़ती दरिया ,
अपने सिकुड़ते किनारों से
एक झूठी कहानी कहती है
या सच के चुल्लू में
वो क़ैद सी रहती है
एक शब है जो ,
बिस्तर की सलवटों में
छुपा के मुँह रोती रहती है
प्रतिभा चौहान
अफसूँ = जादू , रिदा = बुत , निगारिश = तहरीर ,
जोबन= अरुणिमा,
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