मेरे हिस्से में -
न तेरी रात आयी-न दिन आया ,
बस अनकहे इंतजार में -
मैं फक्त दीवार पे टंगी घड़ी में
- चुभें कांटो सा वक्त बन जाती हूँ ,
बस तेरी ओर सरकते हुए -
अपने वजूद को सिसकते देखती हूँ ,
और आस लिये -
तेरी फुरसत की तंग गलियों में
बाट जोहती ख़्वाब बुना करती हूँ ,
तेरे उन फुर्सत के लम्हो का -
जब हम होंगे करीब और साथ ,
पल भर के लिए -
इस अहसास का झोंका
- मेरे दिल-दरीचे की तपिश को
दे जाता छाँव ,
फिर उस झौके के इंतजार में -
घड़ी में गहरे धँस मैं खाली हाथ
- लगाती हूँ बाजी साँसों की -
इंतजार का अगला दौर-दांव !
प्रतिभा चौहान
न तेरी रात आयी-न दिन आया ,
बस अनकहे इंतजार में -
मैं फक्त दीवार पे टंगी घड़ी में
- चुभें कांटो सा वक्त बन जाती हूँ ,
बस तेरी ओर सरकते हुए -
अपने वजूद को सिसकते देखती हूँ ,
और आस लिये -
तेरी फुरसत की तंग गलियों में
बाट जोहती ख़्वाब बुना करती हूँ ,
तेरे उन फुर्सत के लम्हो का -
जब हम होंगे करीब और साथ ,
पल भर के लिए -
इस अहसास का झोंका
- मेरे दिल-दरीचे की तपिश को
दे जाता छाँव ,
फिर उस झौके के इंतजार में -
घड़ी में गहरे धँस मैं खाली हाथ
- लगाती हूँ बाजी साँसों की -
इंतजार का अगला दौर-दांव !
प्रतिभा चौहान
No comments:
Post a Comment