ग्याहरवीं मंजिल पे
खिड़की से झांकती हवा
भीतर प्रवेश करके
उसकी देह को सहला रही थी
और
वह
उसकी सिहरती देह में
उंगलियों से
उकेर रहा था
अपना स्पर्श
हुसैन की पेंटिंग्स की तरह
उसके
श्याम तन के कैनवास पर
कई रंग
उतार चढ़ाव के लिए मचल रहे थे
पर
उसकी आंखें
वो तो पढ़ रही थी
उसके चहरे पर
लिखा
वो
पारदर्शी वाक्य
जो बना था
मिल कर ढाई आखर से
*प्रतिभा*😊
No comments:
Post a Comment