Friday, July 19, 2019

तुम्हारे मौन शब्दो का सिरा
पकड़ कर ~
तुम्हारे मन भीतर
पहुच कर देखी - चाहनाओ की एक नदी...!!

जिसके एक किनारे पर
में खड़ी थी ...
और तुम - मीठे प्रेम की चाह लिए दूसरे किनारे पर ...!!

बहुत कुछ कहना था तुम्हें ~
पर तुम खामोश थे !!
हाँ , पर तुम्हारे मौन स्वर की
प्रतिध्वनि ~
चीख कर कह रही थी सार ~
के कुछ नही चाहा तुमसे सिर्फ तुमको चाहा...!!

और फिर तुम बेबस भँवर से ~
मौन लहरों सा बोल उठे - चलो चलें  प्रवाहित होने ~
हम दोनों थामें संग संग अपने अपने सिरों को ~
और समा जाएं जहाँ समागम  हो ~
अपनी प्रतिध्वनी का 🙂
प्रतिभा

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