तन की भुरभुरी जमी पर~
तुम्हारे नेह से भरी ~शबनम की बूंदे ~
मन को नम तो कर देती है !!
पर अगले ही क्षण
विरह की रेत लिए
ये बैरी पवन का हिंडोला
उड़ा ले जाता संग अपने
और फिर दिन भर मन
सूरज की अगन समान तपता रहता है
आतप आकुल हिया दिन भर जलता है
सांझ का चौखट पर आने का
इंतिजार करता रहता है।
फिर ख्वाबो की जमी पर ।
आती अपनी रात
सजती तारो की बारात
जिसमे जुगनुओ की -
महफ़िल रास करती
और फिर उपजती
वही शबनम
जिसकी बूंदों में समा कर
तुम्हारा इश्क ~फिर
तर देगा इस देह की ,
भुरभुरी जमी को !!
प्रतिभा
तुम्हारे नेह से भरी ~शबनम की बूंदे ~
मन को नम तो कर देती है !!
पर अगले ही क्षण
विरह की रेत लिए
ये बैरी पवन का हिंडोला
उड़ा ले जाता संग अपने
और फिर दिन भर मन
सूरज की अगन समान तपता रहता है
आतप आकुल हिया दिन भर जलता है
सांझ का चौखट पर आने का
इंतिजार करता रहता है।
फिर ख्वाबो की जमी पर ।
आती अपनी रात
सजती तारो की बारात
जिसमे जुगनुओ की -
महफ़िल रास करती
और फिर उपजती
वही शबनम
जिसकी बूंदों में समा कर
तुम्हारा इश्क ~फिर
तर देगा इस देह की ,
भुरभुरी जमी को !!
प्रतिभा
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