Friday, July 19, 2019

अधूरी ख्वाहिशे
रोज शोर मचाती
चीख चीख अपनी
और बुलाती
कदम बढ़ने को
मचलते
पर कुछ बंदिशें
कुछ जंजीरें
जकड़ लेती
और पाँव
खुद ब खुद
ठिठक जाते
उत्कंठित
 आसमां तले
हथेली खोल
बैठ जाती हूँ
आँखो से
झरती बूंदों को
मुटठी में कैद
करने की
कोशिश करती
बूंदों  के साथ
अंजुरी
से
कतरा - कतरा
ख्वाहिशे भी
फिसलती रहती
सिर्फ हथेलियां गीली
रह जाती
हाथ कुछ नही बचता
बस बचती
अंतस की छटपटाहट
और एक आस ........

#प्रतिभा_चौहान

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