Tuesday, October 20, 2020

अहसास

 खिड़की की ओट में

वो हवा का झोंका

देह को छू कर गुज़रा

और रुह तक जा गुज़रा


और..


तुम और तुम्हारी याद

 मेरे बदन की सिरहन से

वाक़िफ़ होती रही

बदहवासी अपनी

 उंगलियों से 

उकेर रही थी

Mural


वो murals

उसके रंग और सुगंध...

और

देह पर

कई रंगोलियों की 

वही पुरानी जुस्तजू

कुछ दर्दों के झमेले

फिर

वही अकेली खिड़की

और...


और...

 हम अकेले


दूर तक ठहराव देर तक

खामोशी और...

 उतार चढ़ाव 

यादों की सलवटें

कराहटें और 

उसकी आंखें और उनमें

वही दर्द

जिन्हें  पढ़ रही थी 

उसके चहरे पर 

लिखा

 वो

पारदर्शी वाक्य

जो बना था

 #इश्क_वाला_लव


#प्रतिभा_चौहान

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