खिड़की की ओट में
वो हवा का झोंका
देह को छू कर गुज़रा
और रुह तक जा गुज़रा
और..
तुम और तुम्हारी याद
मेरे बदन की सिरहन से
वाक़िफ़ होती रही
बदहवासी अपनी
उंगलियों से
उकेर रही थी
Mural
वो murals
उसके रंग और सुगंध...
और
देह पर
कई रंगोलियों की
वही पुरानी जुस्तजू
कुछ दर्दों के झमेले
फिर
वही अकेली खिड़की
और...
और...
हम अकेले
दूर तक ठहराव देर तक
खामोशी और...
उतार चढ़ाव
यादों की सलवटें
कराहटें और
उसकी आंखें और उनमें
वही दर्द
जिन्हें पढ़ रही थी
उसके चहरे पर
लिखा
वो
पारदर्शी वाक्य
जो बना था
#इश्क_वाला_लव
#प्रतिभा_चौहान
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