Friday, July 19, 2019

सुनो..
कुछ चिट्ठियां लिखनी  है तुमको

लिखने है वह सारे लम्हे
जिनमे होती थी तुमसे बातें
तुम्हारे बगैर ,,
तुमसे जुडी बाते
आदतन ....
और
वह बिस्तर की शिकन पर
झरोखे से झाँकती
और सिलवटों में
 सिमटती पहली धूप
थोड़ी भेजनी है तुमको
साथ मे ।

लिखनी है वह  चिठ्ठी जिसमे
सिमटे हैं
वो
लम्हें गर्मी  की
तपती दुपहर के
जब पास पास
खड़े थे
छज्जे पर हम
वह तुम्हारे तपते बदन
की तासीर से पिघलती मै
और वह लरजती धड़कन
भेजनी है तुमको ।

लिखने है वह लम्हे
जब सर्द रात में
खुलें आसमाँ के नीचे
 हम  दोनो
  तुम्हारे काँधे  से ढलकती
ओस की बुँदे
जो तर करती रही मेरे होंठो को
सुनो वह मेरे
लबो की थरथराहट
भेजनी है तुमको ।

लिख भेजनी है मुझे
सुनो
पर कहाँ किस शहर

प्रतिभा  चौहान -----☺️

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