मेरा ना घर ना कोई ठिकाना है
सारा जहाँ ही मेरा आशियाना है ।।
गुरुरो ग़रज़ गैरत से आजिज़ हुआ ।
समझे आक़िल खुद को जमाना है ।।
भटक रहे है कब से दर बदर ।
बस इल्म का दीप जलाना है ।।
अजनबियों की अज़ब अदाओं से ।
छुपा भीतरअफ़सुर्दा अफसाना है ।।
छोड़ सारे अज़ाब -अफ़सोस प्रतिभा ।
हर आलम में खुद को आजमाना है ।।
प्रतिभा
सारा जहाँ ही मेरा आशियाना है ।।
गुरुरो ग़रज़ गैरत से आजिज़ हुआ ।
समझे आक़िल खुद को जमाना है ।।
भटक रहे है कब से दर बदर ।
बस इल्म का दीप जलाना है ।।
अजनबियों की अज़ब अदाओं से ।
छुपा भीतरअफ़सुर्दा अफसाना है ।।
छोड़ सारे अज़ाब -अफ़सोस प्रतिभा ।
हर आलम में खुद को आजमाना है ।।
प्रतिभा
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