Friday, July 19, 2019

जो मेरे आंगन आती
रोज चिरैय्या
उसी से अक्सर
बात करती हूं
कह नही पाती
किसी से जब हाल ऐ दिल
उसी से बयाँ करती हूं
दाने की जगह
अपनी परेशानियों
को बिखेर देती हूं
और वो
चुप से
मेरे गिले शिकवे
चुन चुन
चुगती रहती है
पर वो अपना
दर्द कैसे  कहे
किसको बताये
प्रतिभा

No comments:

होंठ

 इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता  मेरा बैरी  ने  जो होंठों से मेरे मिलाए  हों...