Friday, July 19, 2019

न साँसों में कोई आँच बची ~
न ही दहकती आस बची !!
इक ज़रा से जो हम बचे थे ~
वो भी इंतिजार की भट्टी मे सुलग  चुके !!
सुनो ~
अब लौट के न आना !
आखिर खाक से क्या पाओगे 🙂
©️ प्रतिभा

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होंठ

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