Tuesday, October 27, 2020

☺ आकांक्षाओं की चौखट पे

एक प्रेम का घेरा था ,

यूँ मेरे दिल में..

 एक आहट थी और...

 बेबसी ने घेरा था,

वो जो पूरा चांद था ..

उस दिन.. ....

कुछ अलग अधूरा था

चाँदनी थी , रात थी..

हाँ और अंधेरा था

तमन्नाओं की तारीकी में

उस दिन........

धुला धुला सवेरा था..

जो सिर्फ़ मेरा था कल तक

मेरा पागल दिल बैरी

निगोड़ा अब न मेरा था...

उड़ते गए सब होश के पंछी

यूँ अहेरी का बसेरा था 

उठती है अब ख़ाक फ़क़त

उस सूने मदफ़न में.......

एक प्रेम का जहाँ डेरा था ...

एक प्रेम का जहाँ डेरा था ...


प्रतिभा चौहान

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