Friday, July 19, 2019

ज्येष्ठ की दुपहर -
उग्र लपट लू में ,
तपते झुलसते हुए -
दो पथिक ह्रदय  ,
भटक रहे थे भ्रांत
आ ठहरते फिर वो-
 गुलमोहर की छाँव ,
हरे हरे पत्तो से -
छन - छन आ रही बयार ,
जो काट रही थी लू का ताव ..
लाल-लाल सुमन गुलमोहर के
- बिखरे पड़े धरा पर ,
देखकर-
 पुष्प का सौंदर्य उस ठाँव ,
कई भाव उमड़ने लगे अंतर,
होने लगा मौन नैनो का मिलन
सन्नाटे में होने लगी मुखर साँस
रूप गंध कापाते ही स्पर्श
हो जाता है -
दोनों ह्रदयों का आलिंगन ,
देख ये 
दृश्य ,पुलकित होकर
अरुण जाता हो अस्त ,
पीत गेरुआ वस्त्र -
पहन आ जाती साँझ ,
पक्षियों का कलरव
- हो जाता शांत ,
गहराने लगता -
गौधुली बेला का रंग ,
बहने लगती -
मंद मंद ठंडी पवन ,
शीतल होकर दोनों ह्रदय
चल देते -
नवल प्रभात की ओर ,
बनकर-
 एक दूसरे का आलंबन ,

प्रतिभा

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