Friday, July 19, 2019

उमड़ घुमड़ घिर घिर छाये
नभ पर कारे कारे घन।
आई ऋतु अब सावन की।
सावन की,मनभावन की।।

रची मेंहदी हाथन में
नैनन में आँजा कजरा।
बाट जोहती मैं पगली
आए ना अब तक सजना।
आई है सखि ऋतु अब तो
पी संग रास रचावन की।
आई ऋतु अब सावन की।
सावन की,मनभावन की।।

रिमझिम रिमझिम कर बरसा
भीगे मन,भीगे अँचरा
आ चल सखि अब बागन मे
झूला झूलन मन करता।
आई है सखि,ऋतु अब तो
सखि संग संग झूलन की।
आई ऋतु अब सावन की
सावन की,मन भावन की।
प्रतिभा

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