Friday, July 19, 2019

बंदनी
एक सीमित दायरे मे
अदृश्य डोर से
एक केंद्र बिंदु
से बंधी
उन्मुक्त उड़ती
एक परिधि
के भीतर
देखती रहती
अनगिनत स्वप्न
उनींदे नयन से
जिनको
 भोर की लाली
होते ही
आँखो में
गहरे काजल
की परत से
छुपा देती
स्व-अस्तित्व की
अभिलाषाओं से
नदारद
काठ देह
को ढोती
स्तब्ध
कठपुतली सी
बंदनी
बंधनो की

#प्रतिभा

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