Friday, July 19, 2019

एक तरुणी  सुकोमल
नयन जिसके चंचल
अधर जिसके रसीले
अंग अंग हैं नशीले

खेलती  घने केशो से
कुछ खोयी खोयी  सी
बैठी एक उपवन  में
बात लिए कुछ मन मे

चमेली सी सुगंधित
स्वास , गुंजन बढ़ा रही
चंचल मधुपो का

देख ये दृश्य आतुर हुआ
क्यों वंही गया थम ?
वो नटखट हवा का झोंका
किसने इसको रोका?

मदहोश,मदमस्त हो होकर
उस शोख रक्त कली के आ पास
छू लेता तन
और चन्द्र मुख पर रख देता चुम्बन

और उसके हठीले नयनो में
अपलक निहारता
देख् नेह का उजियारा
मृगनैनी रसीले नयन झुका

मूक आमंत्रण लेती मान
और बह चलती
पेड़ो की डाली पर झूलती हुई
सिंधु की लहरों से खेलती हूई

आनंदित  हो,
मलंग समीर के संग
सुगंधित करने
सारा चमन

---------------
प्रतिभा चौहान

No comments:

होंठ

 इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता  मेरा बैरी  ने  जो होंठों से मेरे मिलाए  हों...