सुनो न
चलो
मुक्त हो उड़ान भरते
और पहुच जाते हैं
क्षितिज के पार
आसमा से दूर
उसी
चश्में के पास
जिसके करीब बहती है
एक शहद की नदी
वंही शीतल अहसास बन
सौप दूँगी
मैं अपना वसंत
और तुम्हारे स्पर्श
के सौंधेपन से
महक उठेगा
मन
और
वंही...
शहद की नदी के किनारे
बो देंगे
अपने
अभिसार के पलो को
जिससे उपजेंगे
प्रेम के नए स्रोत
जो देंगे
प्रेम-सुख को अर्थ
जो आत्मा से उपजता है
देह से परे जाकर
प्रतिभा
No comments:
Post a Comment