Friday, July 19, 2019

सांसों का
परिंदा
कुछ इस तरह
गर्म सलाखों से बनी
जिंदगी में
कैद हुआ

जहां-----
घुटन
और
तन्हाई के सिवा
कुछ ना मिला

सांसें पंख सिकोड़े ,
सहमी हुई ,
परवाज़
के लिए तड़पती रहीं ,

तभी दिल नें
आहिस्ता से
धड़क कर
नर्म सांसों को
अपने आगोश में
ले लिया ,

सांसों को
दिल का
सहारा क्या मिला ?

वो
उसकी बाहों के
आगोश में
पिघलती चली गईं ,

और इस तरह
अब उसे नज़र आने लगी---
खुलती हुई
एक आस की
खिड़की

जिस से आती हुई
स्नेह की
ठंडी बयार ने
घुटन और तन्हाई की
तपिश को यूं ख़तम कर दिया

मानों ------
कभी उनका वज़ूद
था ही नहीं ।।
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********प्रतिभा चौहान********
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