सुनो
बैठी हूँ
यादो के आंगन की
गुनगुनी धूप मे
हथेली में भींच कर्
पिछले दिसम्बर के
नरम मखमली अहसास
हो गयी हूँ सचेत
कहीं फिसल ना जाये
कोई याद
कोई बात
जो बारह महीनों से
रखी है सम्भाल
अपने दिल के पास
ये देखो
मौसम में नमी आ रही है
आसमाँ में हल्का हल्का
धुंआ सा उठ रहा है
ये कैसा धुंआ है
जो माहौल को
मदहोश कर रहा है
ओह.. अब समझी
ये धुँआ नही
खुशबू है, उन पलों की
जो हमने
बिताए थे
पिछले दिसम्बर
में एक साथ
प्रतिभा
बैठी हूँ
यादो के आंगन की
गुनगुनी धूप मे
हथेली में भींच कर्
पिछले दिसम्बर के
नरम मखमली अहसास
हो गयी हूँ सचेत
कहीं फिसल ना जाये
कोई याद
कोई बात
जो बारह महीनों से
रखी है सम्भाल
अपने दिल के पास
ये देखो
मौसम में नमी आ रही है
आसमाँ में हल्का हल्का
धुंआ सा उठ रहा है
ये कैसा धुंआ है
जो माहौल को
मदहोश कर रहा है
ओह.. अब समझी
ये धुँआ नही
खुशबू है, उन पलों की
जो हमने
बिताए थे
पिछले दिसम्बर
में एक साथ
प्रतिभा
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