कुछ रिश्तो की उम्र पत्तियों की मानिंद होती ,कुछ दिन हरी फिर रंगत बदलने लगती कितना भी नेह जल से सींचो *सूख* जरूर जाती
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इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता मेरा बैरी ने जो होंठों से मेरे मिलाए हों...
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