वो जो चुप्प रहता है
अपनी इस चुप्पी से -
महाकाव्य लिखता है ,
घिरती जब घटा घनघोर
टप टप बूंदों के संगीत पर
मारुत- स्पर्श सुखद
- मृदु अनुभूतियाँ धरता है ,
अपनी इसी चुप्पी से
महाकाव्य लिखता है ,
कल-कल छल-छल
कोलाहल सरिता का
चल देती जब
सिंधु-मिलन को
हो मगन
सरिता के इस
उतावलेपन को देख ,
मद्विम मुस्काता है
अपनी इस चुप्पी से
महाकाव्य लिखता है ,
जब आकाश धरा
और हो जाये सबकुछ
कुछ धूमिल-कुछ सतरंगा
जानो कि मुखर छन्द
वो भाँति-भाँति रचता है ,
अपनी इस चुप्पी से
महाकाव्य रचता है
वो जो चुप्प रहता है ।।
प्रतिभा चौहान
अपनी इस चुप्पी से -
महाकाव्य लिखता है ,
घिरती जब घटा घनघोर
टप टप बूंदों के संगीत पर
मारुत- स्पर्श सुखद
- मृदु अनुभूतियाँ धरता है ,
अपनी इसी चुप्पी से
महाकाव्य लिखता है ,
कल-कल छल-छल
कोलाहल सरिता का
चल देती जब
सिंधु-मिलन को
हो मगन
सरिता के इस
उतावलेपन को देख ,
मद्विम मुस्काता है
अपनी इस चुप्पी से
महाकाव्य लिखता है ,
जब आकाश धरा
और हो जाये सबकुछ
कुछ धूमिल-कुछ सतरंगा
जानो कि मुखर छन्द
वो भाँति-भाँति रचता है ,
अपनी इस चुप्पी से
महाकाव्य रचता है
वो जो चुप्प रहता है ।।
प्रतिभा चौहान
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