Friday, July 19, 2019

खेलन आओ
फाग सजन

मार रंग से भरी
पिचकारी
कर दे
कोरी
चुनरिया
मेरी
इंद्रधनुष सी
सतरंगी
निराली

रंगों से कर के
सराबोर
मुझे
बना दे
मुझको
रंग
रंगीली
रूपाली

गाल चढ़ा
गुलाल
लाल लाल
और
ओठ पर लगा
पलाश फूल
से लाली
रंग इतने
रंगों से
आज सजन
दिखू  मै
सबसे
मतवाली

चढ़े न
कोई
दूजा रंग
हो ऐसे
चटकते
गाढ़े
तेरे
प्रीत के रंग
से रँगी
मेरी होली

खेलें
आओ
मिल कर
फाग सजन

प्रतिभा
मेरा ना घर ना कोई ठिकाना है
सारा जहाँ ही मेरा आशियाना है ।।

गुरुरो ग़रज़ गैरत से आजिज़ हुआ ।
समझे आक़िल खुद को जमाना है ।।

भटक रहे है कब से दर बदर ।
बस इल्म का दीप जलाना है ।।

अजनबियों की अज़ब अदाओं से ।
छुपा भीतरअफ़सुर्दा अफसाना है ।।

छोड़ सारे अज़ाब -अफ़सोस प्रतिभा  ।
हर आलम में खुद को आजमाना है  ।।

प्रतिभा
रात बहुत दिनों बाद
कमरे में मेरे
चाँद  उतरा
लिए साथ  आया
अपने वो
वही अहसास
निकाले मैंने भी
सिरहाने से
तकिए तले
सहेजे हुए
वो पल
वो याद
छेड़ता रहा वो
बात
नयी और
कुछ पुरानी
देती रही
में भी साथ
और
रखती रही
तकिए तले
छिपा कर
फिर से ,
उसके साथ
गुजारे क्षणों
की सौगात
और
फिर
आकाश
 होने लगा दूधिया
और वो
उसी झरोखे से
 जा वापस
कंही  खो
गया
और मैं
उस मेहमान
के साथ
अगली
मुलाकात
का स्वप्न
सजा
अपने स्वप्न 
से निकल
झरोखे से
बाहर देखने लगी ।।

#प्रतिभा
जिंदगी-------
अपने रुपहले कैनवास पर
कई रंग बिखेरती
चटक रंग
खिलखिलाते हुए
होठों पर
बिखर कर
मन के भीतर
सतरंगी अहसास
उड़ेल देते
जो कभी फीके
और तीखे होकर
सांसो की लय ताल पर
चढ़ते और उतरते
और अचानक
कभी
ये खिलखिलाते रंग
मन पटल पर
खामोश हो
बैठ जाते
आंखों से ढलक
अंजुरी में भर जाते
और
ये झर झर बूँदे
फैल जाती
 मेरे आँचल  में
मोती बनके 
हर रंग से सज कर
जिंदगी का
ये कारवां
यूँ ही
चलता रहता
और इठला कर्
 मुझे
पीछे पीछे
चलने को लुभाता
रहता ।

#प्रतिभा_
मातृत्व ---
शाश्वत आनंदमयी 
अनुभूति,
परिभाषित
सम्पूर्ण तृप्ति,
प्रगाढ़ता
स्त्री -पुरुष के
सम्बन्धो की,
है आधार
उर्वरक धरा का,
सृष्टि रचियता
व अपरा का,
आधारों का मूल्य
रोपित करता
अति सूक्ष्म बीज
नेह जल सींचता
नवांकुर को
और होता है
नए रूप में
प्रादुर्भाव
मातृत्व की
अनुभूति का

#प्रतिभा_चौहान
एक नई कविता फिर से
वही मत सोचना फिर से
काम तुम्हारे की तारीफ
मैं कर रहा हूँ फिर से
छू गयी वो पुनः आसमान
वो है प्रतिभा चौहान।।

कुछ लूट सा गया था
कुछ रूठ सा गया था
दरीचे पे पत्थर आया
कांच टूट सा गया था
दरवाजा खोल करे अहसान
वो है प्रतिभा चौहान।।

गमो में खुशी की छाया
बादलों में चांद आया
धूप में छाते जैसी
गहरी है जिसकी माया
टूटी दोस्ती की परवान
वो है प्रतिभा चौहान।।

कहानी नई लिख रहा
कविता फिर गढ़ रहा
दोष न देना फिर मुझे
झाड़ चने पर  चढ़ रहा
सोच सोच होये हलकान
वो है प्रतिभा चौहान।।
बस दिन ढल जाता है   रात गुजरती नही
कटे जा रही है ज़िन्दगी जान निकलती नही

#प्रतिभा

आ. रमेश विनोदी जी द्वारा मिली शब्द भेंट

नील वसन मृदु स्मित निश्छल
श्याम श्वेत नयन मन खंजन
आभित दृग अधर मन मंडल
चक्र ग्रीवा सोहत मणिधर
नमामि प्रतिभा त्वम मम मन।

मन उत्ताल लहरों पर नृत्यातुर
पाकर प्रीति प्रबल प्रत्यातुर
भाव विहग चातक सम चातुर
नित नित निरखै नयन कातुर
चन्द्र शशि सम आभित मन
नमामि प्रतिभा त्वम मम मन।

बादलों से हल्का है चितवन
फागन फागन सावन सावन
कूल सरिता सा नीलम जल
लहर -लहर पावन - पावन
भर रजनी नील परी हाथ थामे
उपवन उपवन कानन कानन
नमामि प्रतिभा त्वम मम मन

गलबहियां चांद सितारों से की
महल महल प्रांगण प्रांगण
प्रणय पावक दग्ध सखी अब
मन मनसा जीवन जीवन
दृषित तृप्त नयन मेरे
अरुनकाले ज्यों उपवन
नमामि प्रतिभा त्वम मम मन
अमलतास के पीत कपोलों
के झुमर से
चांदनियाँ बिखरती है
जब छन छन कर,
आ ठहरे दो बावरे मन
तब उसके तले
स्मित मुस्कान
अधरों पर लिए,
दो प्राणों का
संगम होता
उस एकांत उपवन में
दो भावो का
मिलन होता
उस हृदय कानन में,
पतझङ में भी
तब रस बरसने लगता
और भीगने लगते
दो मन तब
आहिस्ता आहिस्ता,
तब शर्मीली सी लता
तरुतन लिपट जाती
चन्द्र किरणे भी तभी
वारिद ओट हो जाती
ठहरे हुए उन पलों मे
 तब तुम कहते
में  चलूँ प्रिये----
उदासी की गहरी
खामोशियां तब
फ़िज़ां में छा  जाती
और ओस की बूंद
कपोलों  से उतर
अधरों पर  बिखर जाती
तुम पीकर वो बून्द
कलकल देते
इसी अमलतास तले 
मिलेंगे -- ----
कह कर चल देते
और  मैं
धूप का
पहला बोसा पाकर
इठला जाती
नदिया सी----

#प्रतिभा
वो सितम्बर
का महीना
तेज बारिश
 औऱ वो
बूंदों की खनक
याद है ---
वो पहली मुलाकात
और वो धरा से
बादलो के स्पर्श
की खनक
और
चाहतो के समंदर में
उठते अहसासों की खनक
याद है ------
तुम्हारे
हाथ थामने पर
 मेरे कंगन
और
चूड़ियों की खनक
ये देख्
तुम्हारे होठो
पर बिखरी
हँसी की खनक
याद है ----
तुम्हारा हाथ पकड़
चला पहला
 वो कदम
और इठला
कर मचलती
साथ चलती
मेरी
पायल की खनक
याद है -----
वो पल
जिस क्षण
प्रेम पल्लवित
हुआ
उस
लम्हे की खनक
जिसकी ये आज
कहाँनी है बनी

#प्रतिभा

Raxit Dave जी द्वारा
गुजराती अनुवाद

સપ્ટેમ્બરનો એ મહિનો
મુશળધાર વરસાદ
અને
એ બૂંદોનો રણકાર
યાદ છે---
એ પ્રથમ મિલન
અને
એ અવની સાથે
વાદળાંનાં સ્પર્શનો રણકાર
અને
ચાહનાઓનાં સાગરમાં ઉછળતાં
અહેસાસોનો રણકાર
યાદ છે---
ત્હારા હાથ ઝાલ્યાં પછી
મ્હારી બંગડીઓ
અને
ચૂડીઓનો રણકાર
આ જો ત્હારા હોઠોં પર ફેલાયેલાં
સ્મિતનો રણકાર
યાદ છે---
ત્હારો હાથ ઝાલીને ભરેલું
એ પહેલું ડગલું અને ડગમગ્યું
હાથ મસળતી
સંગ સંગ ચાલતી
મ્હારી ઝાંઝરીનો રણકાર
યાદ છે---
એ પળ જે પળે
પ્રણય પલ્લવીત થયો
એ પળનો રણકાર
જેની આજે આ રચાઈ છે કહાણી...!!
-પ્રતિભાચૌહાણ   તા.૨૪-૦૫-૨૦૧૭   
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: રક્ષિત અરવિંદરાય દવે તા.૨૯.૦૬.૨૦૧૭
रात ख्वाब में
*बागे फिरदौस* गयी
और सुर्ख़ गुलाबों से
शबनम समेट लायी
कच्ची मिट्टी से तराशे हुए उनके वादे ।
 मेरे ऐतबार की आंच में पकते रहे ।।
प्रतिभा
जब छाए घटा गगन पर
घनघन,घन गहराए।
तन मेरा गीला होए
मन भी भीगा जाए।
उमड़ घुमड़ घिर घिर छाये
नभ पर कारे कारे घन।
आई ऋतु अब सावन की।
सावन की,मनभावन की।।

रची मेंहदी हाथन में
नैनन में आँजा कजरा।
बाट जोहती मैं पगली
आए ना अब तक सजना।
आई है सखि ऋतु अब तो
पी संग रास रचावन की।
आई ऋतु अब सावन की।
सावन की,मनभावन की।।

रिमझिम रिमझिम कर बरसा
भीगे मन,भीगे अँचरा
आ चल सखि अब बागन मे
झूला झूलन मन करता।
आई है सखि,ऋतु अब तो
सखि संग संग झूलन की।
आई ऋतु अब सावन की
सावन की,मन भावन की।
प्रतिभा
आज मिलकर लिखतें है
आखर आखर में  जोड़ूंगी
भाव तुम भर देना
कुछ रिश्तो की उम्र पत्तियों  की मानिंद होती ,कुछ दिन हरी फिर रंगत बदलने लगती कितना भी नेह जल से सींचो *सूख* जरूर जाती
*-------*
ये जीवन बहुत छोटा है ,कितने झमेले  है ,,
उफ़्फ़ !!!!!
एक खत्म नही होता दूसरा तैयार रहता इंट्री लेने को
मेरा तो मानना है कि कितने भी प्रोब्लेम्स आएं
इनको  ज्यादा गंभीरता से लेने की जरूरत नही
ज्यादा गम्भीरता से लेने पर इस से तनाव ही  बढ़ता है
जो आपकी खुशी ,मजे सब उड़ा देती आपकी
रचनाकत्मकता यानी कि नए पन का भी सत्यानाश कर् देती है
इसलिये बेवजह ही सही मुस्कराते रहिये कोई poor jokes भी मारे तो हँस दे क्या जाता आपका  ,, इस से आपकी tension ही कम होगी और गुड़वत्ता भी बढ़ेगी
 यकीन मानिए
सच कह रही आजमाया हुआ नुस्खा है

आपका दिन मुस्कुराता हुआ tension free गुजरे
good daaaayyyyyy
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
अधूरी ख्वाहिशे
रोज शोर मचाती
चीख चीख अपनी
और बुलाती
कदम बढ़ने को
मचलते
पर कुछ बंदिशें
कुछ जंजीरें
जकड़ लेती
और पाँव
खुद ब खुद
ठिठक जाते
उत्कंठित
 आसमां तले
हथेली खोल
बैठ जाती हूँ
आँखो से
झरती बूंदों को
मुटठी में कैद
करने की
कोशिश करती
बूंदों  के साथ
अंजुरी
से
कतरा - कतरा
ख्वाहिशे भी
फिसलती रहती
सिर्फ हथेलियां गीली
रह जाती
हाथ कुछ नही बचता
बस बचती
अंतस की छटपटाहट
और एक आस ........

#प्रतिभा_चौहान
उन्स भी तो उनसे बेपनाह है
जो उज़्ब भी उनकी सह जाते
नही तो हमारे दीवाने बहुत हैं
जो राहों में पलके बिछाए रहते हैं ।।
बंदनी
एक सीमित दायरे मे
अदृश्य डोर से
एक केंद्र बिंदु
से बंधी
उन्मुक्त उड़ती
एक परिधि
के भीतर
देखती रहती
अनगिनत स्वप्न
उनींदे नयन से
जिनको
 भोर की लाली
होते ही
आँखो में
गहरे काजल
की परत से
छुपा देती
स्व-अस्तित्व की
अभिलाषाओं से
नदारद
काठ देह
को ढोती
स्तब्ध
कठपुतली सी
बंदनी
बंधनो की

#प्रतिभा
हर शख्स आपकी कसौटी पर खरा उतरे जरूरी तो नही
कुछ खामियों  के साथ भी रिश्ते निभाये जा सकते हैं
सुनो..
कुछ चिट्ठियां लिखनी  है तुमको

लिखने है वह सारे लम्हे
जिनमे होती थी तुमसे बातें
तुम्हारे बगैर ,,
तुमसे जुडी बाते
आदतन ....
और
वह बिस्तर की शिकन पर
झरोखे से झाँकती
और सिलवटों में
 सिमटती पहली धूप
थोड़ी भेजनी है तुमको
साथ मे ।

लिखनी है वह  चिठ्ठी जिसमे
सिमटे हैं
वो
लम्हें गर्मी  की
तपती दुपहर के
जब पास पास
खड़े थे
छज्जे पर हम
वह तुम्हारे तपते बदन
की तासीर से पिघलती मै
और वह लरजती धड़कन
भेजनी है तुमको ।

लिखने है वह लम्हे
जब सर्द रात में
खुलें आसमाँ के नीचे
 हम  दोनो
  तुम्हारे काँधे  से ढलकती
ओस की बुँदे
जो तर करती रही मेरे होंठो को
सुनो वह मेरे
लबो की थरथराहट
भेजनी है तुमको ।

लिख भेजनी है मुझे
सुनो
पर कहाँ किस शहर

प्रतिभा  चौहान -----☺️
एक तरुणी  सुकोमल
नयन जिसके चंचल
अधर जिसके रसीले
अंग अंग हैं नशीले

खेलती  घने केशो से
कुछ खोयी खोयी  सी
बैठी एक उपवन  में
बात लिए कुछ मन मे

चमेली सी सुगंधित
स्वास , गुंजन बढ़ा रही
चंचल मधुपो का

देख ये दृश्य आतुर हुआ
क्यों वंही गया थम ?
वो नटखट हवा का झोंका
किसने इसको रोका?

मदहोश,मदमस्त हो होकर
उस शोख रक्त कली के आ पास
छू लेता तन
और चन्द्र मुख पर रख देता चुम्बन

और उसके हठीले नयनो में
अपलक निहारता
देख् नेह का उजियारा
मृगनैनी रसीले नयन झुका

मूक आमंत्रण लेती मान
और बह चलती
पेड़ो की डाली पर झूलती हुई
सिंधु की लहरों से खेलती हूई

आनंदित  हो,
मलंग समीर के संग
सुगंधित करने
सारा चमन

---------------
प्रतिभा चौहान
सुनो
बैठी हूँ
यादो के आंगन की
गुनगुनी धूप मे
हथेली में भींच कर्
पिछले दिसम्बर के
नरम मखमली अहसास

हो गयी हूँ सचेत
कहीं फिसल ना जाये
कोई याद
कोई बात
जो बारह महीनों से
 रखी है सम्भाल
अपने दिल के पास

ये देखो
मौसम में नमी आ रही है
आसमाँ में हल्का हल्का
धुंआ सा उठ रहा है
ये कैसा धुंआ है
जो माहौल को
मदहोश कर रहा है
ओह.. अब समझी
ये धुँआ नही
खुशबू है, उन पलों की
जो हमने
बिताए थे
पिछले दिसम्बर
में एक साथ

प्रतिभा
धड़कन बेतहाशा आज मचल रही है
गज़ल गीत संग उलझ कर बहल रही है
.....
क़्यो ढूंढता है मेरी मुहब्बत को इस नगर के हुजूम में।
सच तो ये है अकेले रह गए अक़्सर बफ़ा करने वाले
प्रतिभा
पीली पीली सरसों खेत मे झूम झूम लहराये
ओढ़ चुनरिया पीली गोरी मंद मंद मुस्काये
आ गया मधुमास ,मन ,वन , उपवन हरषाये
ज्येष्ठ की दुपहर -
उग्र लपट लू में ,
तपते झुलसते हुए -
दो पथिक ह्रदय  ,
भटक रहे थे भ्रांत
आ ठहरते फिर वो-
 गुलमोहर की छाँव ,
हरे हरे पत्तो से -
छन - छन आ रही बयार ,
जो काट रही थी लू का ताव ..
लाल-लाल सुमन गुलमोहर के
- बिखरे पड़े धरा पर ,
देखकर-
 पुष्प का सौंदर्य उस ठाँव ,
कई भाव उमड़ने लगे अंतर,
होने लगा मौन नैनो का मिलन
सन्नाटे में होने लगी मुखर साँस
रूप गंध कापाते ही स्पर्श
हो जाता है -
दोनों ह्रदयों का आलिंगन ,
देख ये 
दृश्य ,पुलकित होकर
अरुण जाता हो अस्त ,
पीत गेरुआ वस्त्र -
पहन आ जाती साँझ ,
पक्षियों का कलरव
- हो जाता शांत ,
गहराने लगता -
गौधुली बेला का रंग ,
बहने लगती -
मंद मंद ठंडी पवन ,
शीतल होकर दोनों ह्रदय
चल देते -
नवल प्रभात की ओर ,
बनकर-
 एक दूसरे का आलंबन ,

प्रतिभा
सुनो प्रिये
अनुनय अभिसार का
दिवस से घबराओ नही
में आँचल की ओट कर दूँगी
तपती सख्त धरा को
शेफाली के फूलों सी
सेज कर दूँगी
सुनो प्रिये
अनुनय अभिसार का
पत्तो की छांह से छन कर
आ रही धूप की टुकडियों को
चांदनी सा शीतल कर दूँगी
ठंडी  बयार का स्पर्श दूँगी
,सुनो प्रिये
अनुनय अभिसार का
वल्लरी सी बाहों में भरकर
शुष्क अधरों को
मधु से नम कर दूँगी
तपते तन में
ह्रदय गति हो रही दामनी सी
ये बिखरे केसों की अलकाएँ
रूप यौवन की मदकताएँ
सब तुमको नजर कर दूँगी
सुनो प्रिये
अनुनय अभिसार का
न जाने कब
विदा क्षण आ जाये ,
उमड़ रहे इस पल
इन भावो की स्मृतियों का
तुम्हारे मन पटल पर
पक्के प्रीत रंगों से
इक चित्र अंकित कर् दूँगी ,
सुनो प्रिये
अनुनय अभिसार का

प्रतिभा
जल-बून्द से जैसे -
रश्मि कोई प्रतिबिम्बित ,
वैसे ही बसे
तुम
प्रियतम मेरे चित
अर्पित करूँ
हर सांस तुमपर
करू तुमसे राधा सी प्रीत
तुम्हारे मन क्यारी को
सदा करूँ
स्नेह रस से सिंचित
पर निज भाव
छुपाते तुम
यह नेह
की नही रीत
उर में पीड़ा
एकाकीपन लिए
 तरुणाई मेरी
तुम्हारे प्रेंम से वंचित
चुक गए शब्द सारे
बचा न कुछ शेष
बन जाओ बस मेरे मीत
मनवीणा हो
झंकृत
बने फ़िर नवगीत
प्रतिभा
वो जो चुप्प रहता है

अपनी इस चुप्पी से -

महाकाव्य लिखता है ,

घिरती जब घटा घनघोर

टप टप बूंदों के संगीत पर

मारुत- स्पर्श सुखद

- मृदु अनुभूतियाँ धरता है ,

अपनी इसी चुप्पी से

महाकाव्य लिखता है ,

कल-कल छल-छल

कोलाहल सरिता का

चल देती जब

सिंधु-मिलन को

हो मगन

सरिता के इस

उतावलेपन को देख ,

मद्विम मुस्काता है

अपनी इस चुप्पी से

महाकाव्य लिखता है ,

जब आकाश धरा

और हो जाये सबकुछ

कुछ धूमिल-कुछ सतरंगा

जानो कि  मुखर छन्द

वो भाँति-भाँति रचता है ,

अपनी इस चुप्पी से

महाकाव्य रचता है

वो जो चुप्प रहता है ।।

प्रतिभा चौहान
सपने में तुम आते हो
देख मुझे अकेली

अधरों पर मुखरित होते हैं
प्रेम आमंत्रण तुम्हारे
भावनाये जगाती हैं
मुस्कान तुम्हारी
छूटने सयंम तब लगता है
जब आंख में तुम झाँकते हो
चूम कर मेरी हथेली ।।

सपने में तुम आते हो
देख मुझे अकेली

चाँद भी आकाश पर अटका
देखता रहता  लगाए टकटकी
हवा भी डाली डाली झूल
चल देती बहकी बहकी
सारा आलम तुम्हारे
प्यार में डूबा जाता है
सांस भी महकने लगती
मेरी बन चंपा चमेली

सपने में तुम आते हो
देख मुझे अकेली

माथे आरक्त बिंदिया सजा
लाज़ से लाल चेहरा
अपने पांवों पर टिका
बैठ जाती हूँ जब
आ करीब तुम्हारे
छूटने संयम लगता तुम्हारा
पाकर  मुझे अकेली

सपने में तुम आते हो
देख मुझे अकेली
#प्रतिभा
  pic ,  Diganant bindusar ji
जी की wall से 😊
लो आ गयी ☔️☔️
मौसम की पहली बारिश 🌧️🌧️
छम छम करती हुई 🌧️🌧️
टप टप करती कुछ बूंदे💧💧💧
हथेली पर भी गिरी 😍
बन्द कर ली मुट्ठी ☺️
इस उम्मीद से
फिर से शायद
हर्फ हरे हो जाये 🍃🍃
अंकुरित हो जाये 🌱
फिर कोई भाव 😍
स्फुरण हो जाये
कोई अभव्यक्ति
और
लाल लाल कोंपल 🌷🌷
बन कर सफे पर📝📝
उतर आए कोई कविता
😍😍😍
प्रतिभा
Raxit Dave जी द्वारा गुजराती अनुवाद
લ્યો આવી ગયો
મોસમનો પહેલો વરસાદ...
છમ છમ કરતાં,
ટપ ટપ કરતાં,
કેટલાંક ટીપાં 
હથેળી ઉપર પણ પડ્યાં,
કરી લીધી મુઠ્ઠી બંધ,
એવી ઉમેદથી કે 
કદાચ શબ્દો પુનઃ
હરિત બની જાય,
થઇ જાય અંકુરિત
સ્ફૂરી ઉઠે પુનઃ
કોઈ લાગણી,
કોઈ અભિવ્યક્તિ, 
અને 
રતુમડી કૂંપળો બનીને
થઇ જાય
પૃષ્ઠ પર અંકિત
કોઈ કવિતા....!
-પ્રતિભા ચૌહાણ  તા.૨૭-૦૬-૨૦૧૮
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: રક્ષિત અરવિંદરાય દવે "મૌન"
તા.૨૦-૦૬-૨૦૧૯
जिंदगी की गुल्लक में
कुछ लम्हे इकठ्ठा
कर रही हूँ
हर पहर - कुछ पल
चुरा कर...
तुम संग बिताने
को पूरा दिन
जुटा रही हूँ।
😊
प्रतिभा
तमाम शब
निज
दृगों से
जल बहाकर
किसने
भोर का आँचल
भिगोया है
पर्ण कोरो से टपकते
ये किसकी अश्रुमाला
के टूटे मोती हैं
किसकी ह्रदय पीड़ा को
पुष्प ने अपनी
पंखुरियों में संजोया है
किस दर्द से गुजर
 ये कौंन रोया है
ऐ निशा तू ही बता
किसने ये
भोर का आँचल
भिगोया है ।।
प्रतिभा
कुछ अनकही बातें
कुछ मद्धम कहकहे
सांसो की कंपकपी
स्पर्श की सिरहन
प्रेम की निशानियां
समेटे हुए आँचल को बिछाती
उनींदी आंखे
और उसपर तुम्हारा उन्माद ख्याल
और फिर सिरा जोड़ती
कुछ अनकही बातें 💝
प्रतिभा

मेरे हिस्से में -
न तेरी रात आयी-न दिन आया ,
बस अनकहे इंतजार में -
मैं फक्त दीवार पे टंगी घड़ी में
- चुभें कांटो सा वक्त बन जाती हूँ ,
बस तेरी ओर सरकते हुए -
अपने वजूद को सिसकते देखती हूँ ,
और आस लिये -
तेरी फुरसत की तंग गलियों में
बाट जोहती ख़्वाब बुना करती हूँ ,
तेरे उन फुर्सत के लम्हो का -
जब हम होंगे करीब और साथ ,
पल भर के लिए -
इस अहसास का झोंका
- मेरे दिल-दरीचे की तपिश को
दे जाता छाँव ,
फिर उस झौके के इंतजार में -
घड़ी में गहरे धँस मैं खाली हाथ
- लगाती हूँ बाजी साँसों की -
इंतजार का अगला दौर-दांव !
प्रतिभा चौहान
ये इन नूपुरों की खनक है
या तुम्हारी बेतहाशा मचलती धड़कनों की आहट !!
खुशरंग हिना की चमक है
या तेज़ साँसों की गर्माहट !!
मैं कैसे यकीन कर लूं की तुम नही हो
जब तुम्हारा ही नशा पुरज़ोर है !!
खुद को कैसे राहत दिलाऊं
जब मुहब्ब्त का दौर ही चितचोर है 💞

प्रतिभा चौहान
....
तुम पर तो मै देखना कभी बेहिसाब लिखूंगी ।
ना कोई देखे न समझे  वो किताब लिखूंगी  ।।

मौन की भाषा अश्कों की अदृश्य स्याही से ।
हे प्रिये ! प्रणय निवेदन मै कोई खास लिखूंगी  ।

नीले फलक पर श्वेत हंसो को सजा कर  ।
हे प्रिय! तुम्हारा नाम  मै अपने साथ लिखूंगी ।।
                                                        प्रतिभा
जो मेरे आंगन आती
रोज चिरैय्या
उसी से अक्सर
बात करती हूं
कह नही पाती
किसी से जब हाल ऐ दिल
उसी से बयाँ करती हूं
दाने की जगह
अपनी परेशानियों
को बिखेर देती हूं
और वो
चुप से
मेरे गिले शिकवे
चुन चुन
चुगती रहती है
पर वो अपना
दर्द कैसे  कहे
किसको बताये
प्रतिभा
चलो आज…..
बोरिंग दाल सब्ज़ी से हटकर…..
कुछ रोमांटिक 😍बनाती हूँ तुम्हारे लिए.....
आज तुम्हारे टिफ़िन को ….
सजाती हूँ ज़रा दीवानगी से.....☺️
कुछ अलग डिश !!!!
दिल को कढ़ाई  बनाकर…..
अहसासों की अंगीठी पर…. 😍
आवारगी के मसालों के साथ……😃
तुम्हारे साथ बीते पलों की चाहत का बघार लगाऊं….😍
अरमानों की सिज़्ज़लिंग से..😊
नरम सांसो का एरोमा….. उफ़्फ़फ़..😊
और फिर धड़कनों की गार्निशिंग के साथ….
बोशे की लज्जत लिए बनाऊं ….😘
" #इश्क_रेसिपी " ..... 💞
प्रतिभा 😊
सांसों का
परिंदा
कुछ इस तरह
गर्म सलाखों से बनी
जिंदगी में
कैद हुआ

जहां-----
घुटन
और
तन्हाई के सिवा
कुछ ना मिला

सांसें पंख सिकोड़े ,
सहमी हुई ,
परवाज़
के लिए तड़पती रहीं ,

तभी दिल नें
आहिस्ता से
धड़क कर
नर्म सांसों को
अपने आगोश में
ले लिया ,

सांसों को
दिल का
सहारा क्या मिला ?

वो
उसकी बाहों के
आगोश में
पिघलती चली गईं ,

और इस तरह
अब उसे नज़र आने लगी---
खुलती हुई
एक आस की
खिड़की

जिस से आती हुई
स्नेह की
ठंडी बयार ने
घुटन और तन्हाई की
तपिश को यूं ख़तम कर दिया

मानों ------
कभी उनका वज़ूद
था ही नहीं ।।
💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐💐
********प्रतिभा चौहान********
***************************
तुम्हारी आँखों से ढलका आंसू
हमारी पलकों पे आ गिरा है ।

कैसे बताएं ये दर्द का दरिया
कहाँ बिखरा और कहाँ मिला है

प्रतिभा
तुम्हारे मौन शब्दो का सिरा
पकड़ कर ~
तुम्हारे मन भीतर
पहुच कर देखी - चाहनाओ की एक नदी...!!

जिसके एक किनारे पर
में खड़ी थी ...
और तुम - मीठे प्रेम की चाह लिए दूसरे किनारे पर ...!!

बहुत कुछ कहना था तुम्हें ~
पर तुम खामोश थे !!
हाँ , पर तुम्हारे मौन स्वर की
प्रतिध्वनि ~
चीख कर कह रही थी सार ~
के कुछ नही चाहा तुमसे सिर्फ तुमको चाहा...!!

और फिर तुम बेबस भँवर से ~
मौन लहरों सा बोल उठे - चलो चलें  प्रवाहित होने ~
हम दोनों थामें संग संग अपने अपने सिरों को ~
और समा जाएं जहाँ समागम  हो ~
अपनी प्रतिध्वनी का 🙂
प्रतिभा
तुम संग बिताये
जो क्षण ....है गिनती के
उनकी यादों से बढ़कर
पर ...कोई आनंद नही है
तुम्हे छोड़कर अब कुछ सोचे
मन ... इतना स्वच्छंद नही है
सांस में बस गयी सुगंध तुम्हारी
रोम रोम में बिखरा प्यार तुम्हारा
हर पल महसूस करता है
अंग अंग स्पर्श तुम्हारा
तुम्हे छोड़कर... अब कुछ सोचे
मन ...इतना स्वच्छंद नही है
माना दूर हो मुझसे
पर बहुत करीब हो मन के
बिना किसी बन्धन के
बांध लिया है इस जीवन से
तुम्हे छोड़कर अब कुछ सोचे
मन ....इतना स्वच्छंद नही है ।।
😊प्रतिभा😊
2 बरस पहले लिखी थी
आज नजर पड़ गयी तो पोस्ट कर दी
😃😃😃

फिजाओं का रंग
बदला बदला है
ठूठ हुए अल्फाज को
आवाज .....
अब पहचानती नही
किरदार बदले
कपड़े की  तरह
अपने ही
साये को....
अब जानती नही
दिल पर चढ़ा
सलेटी रंग
गमो का ऐसे
तन्हाई  में भी
सिसकी ....
अब निकालती नही
धुंधले हुए है सफे
जिंदगी की  किताब के
पलटते वर्कों के हर्फ़ों
की जुबां ...
अब मचलती नही
छन छन कर
 आता था कभी वो
मखमली ख्वाबो में
यादे  भी उसकी
बाँहो से ...
अब लिपटती नही

#प्रतिभा
तन की भुरभुरी जमी पर~
तुम्हारे नेह से भरी ~शबनम की बूंदे ~
मन को नम तो कर देती है !!
पर अगले ही क्षण
विरह की रेत लिए
ये बैरी पवन का हिंडोला
उड़ा ले जाता संग अपने
और फिर दिन भर मन
सूरज की अगन समान तपता रहता है
आतप आकुल हिया दिन भर जलता है
सांझ का चौखट पर आने का
इंतिजार करता रहता है।
फिर ख्वाबो की जमी पर ।
आती अपनी रात
सजती तारो की बारात
जिसमे जुगनुओ की -
महफ़िल रास करती
और फिर उपजती
वही शबनम
जिसकी बूंदों में समा कर
तुम्हारा इश्क ~फिर
तर देगा इस देह की ,
भुरभुरी जमी को !!
प्रतिभा
इश्क़ के गलीचे पर बिखरी चांदनी...
धड़कनो की ताल पर शबनम  की बूंदों को…
पाज़ेब बना कर..
  जब जब रक्स करती !!
तब तब ख्वाबो की बारहदरी पर...
उतर कर चाँद बिखरी चांदनी को..
समेट लेता अपनी बांहों में !!
मिलती आपस मे धड़कन ,
और हौले हौले बढ़ते उर स्पंदन...
बन  मृदु लय..............
 बढ़ती साँसों की *धनक* !!
फिर बादलों की करतल पर..
प्रारम्भ होता.......
*#रक्स_ए_इश्क़*
...................
 ©️ प्रतिभा
कुछ न कहो ~
बस ! कुछ न कहो !!
जिक्र न छेड़ो बेकसी  का ~
न बेकली की कोई नज्म दोहराओ!
क्या हुआ ? क्या होगा ?
इन बेतुके सवालो को छोड़ ~
बेबसी के दायरों से निकल कर ,
इन अजनबी से रास्तो पर ~
कुछ दूर तलक ही सही ~
यूँ खामोश मेरे साथ चलो !!
तन्हाई को मिला देने दो हमे ~
कुछ पल के लिए ही सही ,
ये मुलाकात हो जाने दो ।
कुछ न कहो !!
बस ! कुछ न कहो !!

©️ प्रतिभा
कितना बोलते हो तुम !!
हर बात पर बहस ....
जब तक मैैंgive up न कर दूं !!
रोज कितनी नसीहते ... कितनी care..
इन सबमे छुपा तुम्हारा स्नेह 🙂
ऐसे ही न जाने कितनी conversation ,
अहसास के memory card
मे store हैं ।
जब तब उनको recall कर लेती हूँ ,
हमारी chatting के कुछ खास हिस्सो में से ,
कुछ ★बातों की कतरनो★को ~
Select और, cut करके ~
Post कर लिया है अपने सिरहाने ।
जो सिर्फ मेरे को ही seen होती हैं !!
आप perfect हो !!
इसे तो hash tag के साथ -
Copy किया हुआ है !!
अपना ख्याल रखा करो -
ये तो pinned  है ।
और भी बहुत कुछ save है
सिरहाने , जो.......
एकांत मे मेरे आदतन साथी बन हुए हैं ।
पर हाँ !! अब मै तुमको  miss.......
© प्रतिभा
न जाने कब से कितनी अनकही बााते~
आंखों में ठहरी हैं जो ~
एकाकीपन का एहसास लिए जागती रहती हैं !!
वैसे तो रूठी सी हैं ~
फिर भी रोज़ सज-संवर कर ~
सपनो की दहलीज पर ~
तुम्हारा इन्तिजार करती  हैं !!
बस ! तुम किसी रोज चुपके से ~
मेरे सपनो से आ जाना !!
और व्याकुल अभिव्यक्तियों को थपका जाना !
हो सके ज़रा तुमसे तो आ जाना !!

© प्रतिभा

गुजराती अनुवाद
Raxit Dave सर द्वारा

ના જાણે ક્યારથી
કેટલીયે વણકહી વાતો ~
વસી છે જે નયનોમાં  ~
જાગતી રહે છે
એકાકીપણાના અહેસાસ સાથે !!
આમ તો છે રિસાયેલી  ~
છતાં પણ દરરોજ સજી-ધજીને ~
સ્વપ્નોનાં ઉંમરે ~
કરે છે પ્રતીક્ષા ત્હારી !!
બસ ! કોઈ એક દિવસ
છાનોમાનો
આવી જજે
તું
મ્હારા સ્વપ્નો મહીં
અને
વ્યાકુળ અભિવ્યક્તિઓને
થાબડી જજે  !
જો બની શકે ત્હારાથી તો
આવી જજે  !!

- પ્રતિભા ચૌહાણ  તા.૧૧-૦૨-૨૦૧૯ 
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: રક્ષિત અરવિંદરાય દવે "મૌન"
તા.૨૦-૦૬-૨૦૧૯
क्या लिखती हूँ ~ नही जानती !
बस कलम को बेलौस बेढंग सी ~
चला भर लेती हूँ ।
और लिख देती हूँ कुछ भाव !!
जो मैं तुम्हारी आँखों में ~
अक्सर पढ़ लेती हूँ ।
 उन भावो को ~
अलंकारों की चाशनी में कैसे डुबाऊं !!
नही जानती !
और न जानती तुक मिलाना !!
बस जानती हूँ उसमे खुद डूब जाना !!
और फिर उकेर देती हूँ ~
बेतरतीब-छितरे से अनगढ़ शब्द !!
तुम उसे प्यार से संकलित कर ~
बना देते हो कविता ।
और इस तरह मुझे अधूरे से पूरा कर देते हो तुम 💞

©️ प्रतिभा

गुजराती अनुवाद
Raxit Dave सर द्वारा
લખું છું શું -નથી ખબર !
સાચે જ,
કેવળ કલમને
બેઢંગી રીતે ચલાવીને ~
સંગ્રહી લઉં છું
અને
લખી નાખું છું
કેટલીક લાગણીઓ !!
જે પ્રાયઃ ત્હારા નયનોમાં ~
વાંચી લઉં છું
હું  ।
નથી જાણતી !
એ લાગણીઓને ~
અલંકારોની ચાસણીમાં
કઈ રીતે ડુબાડું !!
અને
નથી જાણતી અક્ષરમેળ !!
જાણું છું કેવળ,
સ્વયં એમાં ડૂબી જવું  !!
અને પછી
કરી લઉં  છું અંકિત ~
ઊલટા-સીધા-વિખરાયેલાં-બેઢંગા શબ્દો !!
એને સ્નેહપૂર્વક સંકલિત કરીને  ~
તું
રચી દે છે કવિતા !
અને
આ રીતે કરી દે છે મને
અપૂર્ણથી પૂર્ણ તું !

- પ્રતિભા ચૌહાણ  તા.૧૧-૦૨-૨૦૧૯ 
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: રક્ષિત અરવિંદરાય દવે "મૌન"
તા.૧૯-૦૬-૨૦૧૯
शोर गुल से दूर .. एकांत मन में,
साँसों के साथ हमकदम होकर,
मन के घोड़ों के संग दौड़..
 दिमाग के तर्क को करके अनसुना,
सिर्फ मन की चेतनाओं को सुन कर
मंद मंद मुस्काती हुये!
शब्द शब्द को चांदनी में मढ़कर ही

स्पंदित होती है -
- एक स्वछंद कविता ।

©️ प्रतिभा
इश्क का पैमाना भर कर ,
जब से ये नशा किया है ~
कुछ मीरा सी जोगन बन गयी ,
तो कुछ राधा सी बावरी !!
इस प्रेम खुमार में बस
तुम्हे ही सोच मंद मंद मुस्काती हूं ।
बिन कोई बात नयन छलकाती हूं ।
प्रेम-गीत बना तुमको,
अधरों पर गुनगुनाती हूं ।
तुम्हारी ललित छवि नयनन में समा,
पलक ढाप एकटक निहारतीं हूं ।
पहरों एकांत में तुम से ही बतियाती हूं ।
और तुम्हारे मन को,
अपने तन की देहरी तक ला,
उससे उठती गंध को आत्मसात कर ,
' मैं 'से' तुम '
और तुम से हम बन जाती हूँ ।
और देह मेरी मानो बेजान
होती जाती है ~ प्रेम रस ❣️❣️

©️ प्रतिभा
कुछ चुभ रहा है आंख में खुश्क सा ~
कोई ख्वाब नींद में ही टूट गया हो  जैसे
प्रतिभा
न साँसों में कोई आँच बची ~
न ही दहकती आस बची !!
इक ज़रा से जो हम बचे थे ~
वो भी इंतिजार की भट्टी मे सुलग  चुके !!
सुनो ~
अब लौट के न आना !
आखिर खाक से क्या पाओगे 🙂
©️ प्रतिभा
सरक रही है रात
और
ढलक रहा है
आँचल ,
 शानों से
आहिस्ता- आहिस्ता ,

इश्क पीने की चाह में
मदहोश हो ,
दिल बहक रहें
हौले - हौले ,

सिमट रही,
बाहों के दरम्यान ,
धड़कनों की ज़ुबान
धीरे - धीरे ,

जल रहा है मन ,
और
तन पर गिर कर शबनम ,
हो रही
धुंआ
हल्के -हल्के ,

चाँद
हो गया बादलों की ओट,
देख ये मिलन --
मुस्करा रही रात
मंद - मंद ,

प्रतिभा चौहान

अनुवाद गुजराती में
Raxit Dave जी द्वारा

ઢળી રહી છે નિશા
અને
સરકી રહ્યો છે પાલવ
ખભા પરથી,
હળવે હળવે,

પ્રણય-પાન કરવાની
ચાહનામાં
મતવાલું થઈને,
ચકચૂર થઇ રહ્યું છે હૈયું
હળવે-હળવે,

ભીડાઈ રહી છે,
બાજુઓની વચ્ચે,
વાણી ધબકારની
હળવે-હળવે,

સળગી રહ્યું છે મનડું,
અને
દેહ પર પડીને
ઝાકળબિંદુઓ ,
થઇ રહ્યાં છે
ધુમ્રસેર
હળવે-હળવે,

સંતાઈ ગયો
ચાંદો
વાદળોની આડમાં,
જોઈને આ મિલન --
વેરી રહી છે સ્મિત
નિશા,
હળવે-હળવે.....!

- પ્રતિભા ચૌહાણ  તા.૧૮-૦૬-૨૦૧૯
ગુજરાતી ભાવાનુવાદ: રક્ષિત અરવિંદરાય દવે "મૌન"
તા.૧૯-૦૬-૨૦૧૯
कुछ शोख नज़रें हैं ~
इन शोख नज़रों की
अंगड़ाई से बचना तुम
जो बिखरी रहती है
अक्सर मंद मंद मुस्कान ~
होठो पे फैली इस
हरजाई से बचना तुम
मुश्किल तो है
इज़हारे इश्क करना
इस आतिशे इश्क़ की
रुस्वाई से बचना तुम
यूँ तो ख़्याल बस
एक ख़्याल ठहरा ~
यूँ भी अक्सर करना तुम
तन्हा हो के अपनी ही
तन्हाई से बचना तुम
खो देना खुद को कभी
औऱ खुद को मिल जाना तुम
इस ओह पोह में यार....अपनी ही
परछाई से बचना तुम
दर्द के हिस्से में तुम
गर आ जाओ जब
सबसे घुलना मिलना
चलना फिरना करना सब
मगर...अक्सर ध्यान धरना ये
कि शब्द मीनाई से बचना तुम
दीवाना दीवाना कहता फिरे जो
मुकर्रर इतना सा करना
उस शैदा की भी
शैदाायी से भी बचना तुम
कुछ शोख नज़रें हैं ~
इन शोख नज़रों की
अंगड़ाई से बचना तुम
काश...
तुम्हारी बांहों में
थोड़ा  ठहरती
अपना यौवन
औऱ गढ़ लेती

अपनी उठती
घटती सांसों की
सरगोशियां
और सुन लेती
काश...
तुम्हारी बांहों में
थोड़ाऔर ठहर लेती

खनकती चूड़ियों से
तुम्हारी धड़कनों को
और खनकने देती
काश...
तुम्हारी बांहों में
थोड़ाऔऱ ठहर लेती

तुम्हारी शरारतों
से अपनी काया
को और
बहकने देती
काश..
तुम्हारी
बांहों में
थोड़ा और ठहर लेती

तुम्हारी छुअन से
करधनी की
व्याकुलता
औऱ बढ़ने देती
काश...
तुम्हारी बांहों मे
थोड़ाऔर ठहर लेती

रैन थोड़ीऔर
बढ़ने देती
कजरा -गजरा
और बिखरने देती
काश..
तुम्हारी
बांहों
में थोड़ा और
ठहर लेती

काश....
थोड़ा और
अपने यौवन को
गढ़ लेती😊

प्रतिभा
मैं ,
तुम्हारा पहरों इंतज़ार किया करती हूं ,
ये इंतज़ार के  एक - एक पल भी न ,
मानो ,
जैसे रिमझिम फुहारे हैं…
जो ,
मेरे मन के मरुस्थल की
तपती रेत को ,
भिगोते हुए
ठंडी सिहरन देते रहते हैं ,

ये इंतज़ार का सिलसिला
जो ,
तेरे - मेरे दरमियान है ,
इक डोर हैै वो ----
जज़्बातों  की ,
चंद एहसासों की ,
यही तो है जो ----
बांधे हैं दोनों को इक सिरे से ,
प्रेम की डोर
हम्म $$$
प्रेम की ही डोर
है ना --------😊

ये जो रेशमी अहसास है …
वही
ख्वाबों में भी
साथ बनाये रखता है
मेरा तुम्हारा
और ,
महका देता है प्रेम के मधुमास को

उफ़्फ़ ,
अब ये इंतज़ार
लंबा होता जा रहा है
पल ----
घड़ी में
और
घड़ी
महीनों में
बदल रही है
पर
एक सुकून है
जी रहे है साथ
हम दोनों
इस इंतज़ार को

हम
मिलेंगे किसी दिन..
पर
अभी जी लेने दो साथ में
इस इंतज़ार को
इस चाह को.....
मीठी कसक के साथ

प्रतिभा
कभी किसी को मुक्कमल जहाँ नहीं मिलता
शेर अच्छा है  ,
समझ में भी आता है
पर क्या करूँ
अपनी चाहनाओं का

चाहतों पर तो
किसी का जोर नही
बस चाह लिया तुमको,  क्या करें
तुमसे मिलने की चाहत
बस जैसे हर   ख्वाहिश  की तरह
एक और ख्वाहिश

पर तुम तो ठहरे ,उफ़क
मुझ से तुम तक
का फासला तय करने को
शायद ये उम्र नाकाफ़ी गुज़रे

पर जो तमन्नाये पूरी नहीं होतीं
वो मचलना कब छोड़ती हैं

जब दुनिया से रुख़सत होना हुआ
उस वक्त भी मेरी ठहरी आखों में
लोग देख के ताज्जुब करेंगे

ये किसकी चाहत है
जो मुस्कुरा रही है

प्रतिभा
तुम सुन रहे हो ना ?

हम्म
सुन लिया ,

क्या ?

वही
जो तुमनें  कहा

अच्छा ?
ज़रा बताओ तो
मैंने
क्या कहा ?

वही जो मैंने
सुन लिया ।।

ओ $$
अच्छा
रहने दो
अब
नही बताओ

बस......

इन शब्दों को
हम दोनों की धड़कनों
की सम तरंगों
पर निर्बाध
बहने दो

बोल कर
क्यों
इन शब्दों को
ब्रह्माण्ड
में भटकने के लिए
छोड़ दें

मन मे ही गूंजने दो
सिर्फ़
हमारे और तुम्हारे दरमियाँ
😊
प्रतिभा

होंठ

 इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता  मेरा बैरी  ने  जो होंठों से मेरे मिलाए  हों...