Sunday, February 24, 2019
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होंठ
इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता मेरा बैरी ने जो होंठों से मेरे मिलाए हों...
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सुनो बैठी हूँ यादो के आंगन की गुनगुनी धूप मे हथेली में भींच कर् पिछले दिसम्बर के नरम मखमली अहसास हो गयी हूँ सचेत कहीं फिसल ना जाये...
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जो मेरे आंगन आती रोज चिरैय्या उसी से अक्सर बात करती हूं कह नही पाती किसी से जब हाल ऐ दिल उसी से बयाँ करती हूं दाने की जगह अपनी परेश...
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सुनो न चलो मुक्त हो उड़ान भरते और पहुच जाते हैं क्षितिज के पार आसमा से दूर उसी चश्में के पास जिसके करीब बहती है एक शहद की नदी वंही श...

2 comments:
Brilliant peice
शुक्रिया पंकज
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