Monday, March 4, 2019

नयनो के चाँद

युगों से सूखे
नयन को

तुम सजल कर गए,
सुन ओ चंद्रमा!
तुम तो तन मन को
तरल कर गए ।
छीन कर ले गए
नींद तुम,
मेरी आंखों के सब
नीर तुम ।
टोहें नैन चंद्रप्रभा
तुम्हारी,
तारो के प्रांगण सभा
तुम्हारी।
ओ शशि ओ रजनीचर
दो नयन तुम्हे
ढूंढ रहे हैं
अपलक प्रतीक्षा में
तुम्हारी,
ये चितवन खुलकर
मूंद रहे हैं।
मिलकर निशि से तुम
श्वेत श्याम शांत
निर्मल छवि को,
करोगे शीतल मन या
सौंप दोगे मन को
सुबह के रवि को।
निर्मम दिनकर
झुलसाए हर अंग को,
तुम आना शीतल
चांदनी लेकर
बिखेरना हर मन
हर चितवन रंग को।
वो रंग तुम्हारा
उतर गया है
नयनो के कोरों में
लो शांतप्रभा फिर से
भर आईं मन के छोरों में।।
नयनो के चांद
आ जाना कल फिर
या समेट लो मुझको
किरण किरण
नयन नयन
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प्रतिभा

Saturday, March 2, 2019

दर्द है क्या चीज़ हमे भी बताओ

दर्द
दर्द को कभी महसूस नही किया~
इसलिए पता नही कैसा होता है !

बात बात पर आंखों के कोर से ~
पानी ढुलक जाना, और जी
हल्का होकर भी भारी हो जाना !
कहीं ये दर्द तो नही ??

आँखों में नींद लिए अनदेख वेदना~
करवटे बदलती रात के साथ~
पहरों जिस्म-ओ-जान का करवट बदलना !
कहीं ये तो दर्द नही ??

भीड़ में एकाक तन्हा हो जाना~
और फिर उसी भीड़ में ~
बनावटी मुस्कान चेहरे पर ले आना !
कहीं ये दर्द तो नही ??

अचानक विचारों का ~
अवरुद्ध हो जाना और
अभिव्यक्तियों को व्यक्त करते भी~
व्यक्त न कर पाना !
मानो भावों के भंवर में भाव शून्य हो जाना !!
कहीं ये दर्द तो नही ??

पता नही - पता नही 🙂

©️ प्रतिभा

होंठ

 इक जिंदगी के राज को मेरे छुपाए होंठ कमबख्त ने इस तरह से मेरे दबाए होंठ उफ्फ फो दम ही निकल जाता  मेरा बैरी  ने  जो होंठों से मेरे मिलाए  हों...